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Monday, 8 November 2010

+मानस दीप+

घर की मुंडेर पर
जीने में बने दीवट पर
प्रांगन में प्रहरी
तुलसी के बिरवे के तले
देवालय में प्रस्तर प्रतिमा के आगे
कहां - कहां न जलाए
दीप माटी के
संस्कृति - घाटी के
हमने हमारे पुरखों ने
युगों से यह परम्परा भली -दीप से दीपावली बनती चली |
पर तमस हुआ विलुप्त नहीं
अब भी फासला घनाकार ,
द्वंद्व द्वेष का अंधकार |
तरंगे अनाचार की उत्ताल ,
डूब रहा राम का भाल |
नई प्रतिमाएं गढने से पहले
धर्मधाम नए बनाने से पूर्व
आओ ! राम का मुकुट बचा ले
थाली में दीप जलाने से पहले
जरा मानस दीप जला लें |


ओमीश परुथी,

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